आगरा। भारत की हजारों छोटी नदियाँ और मौसमी धाराएँ आज कूड़े, सीवर और अतिक्रमण के नीचे दबती जा रही हैं। यह अब केवल पर्यावरणविदों की चिंता नहीं, बल्कि देश की जल-सुरक्षा, भविष्य और सभ्यतागत अस्तित्व का गंभीर सवाल बन चुका है। विडंबना यह है कि नदी संरक्षण की राष्ट्रीय बहस गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी कुछ बड़ी नदियों तक सिमट गई है, जबकि इन्हें जीवन देने वाली छोटी नदियाँ योजनाओं, बजट और नीतियों से बाहर रह गई हैं।
आगरा जिला इस राष्ट्रीय विफलता का स्पष्ट उदाहरण है। यमुना की सहायक नदियाँ उतंगन, करबना, खारी सहित छह-सात छोटी धाराएँ कभी इस क्षेत्र की जीवनरेखा थीं। आज ये नदियाँ सूखी रेखाओं में बदलती जा रही हैं। कहीं इनके पेट में ठोस कचरा दफन है, कहीं इनके किनारों पर खेत और अवैध कॉलोनियाँ उग आई हैं, तो कहीं नगर निकायों ने इन्हें ड्रेनेज लाइन मानकर छोड़ दिया है। इनके पुनर्जीवन की मांग वर्षों से उठ रही है, लेकिन प्रशासनिक संवेदनशीलता फाइलों के बोझ तले दम तोड़ देती है।
प्रकृति बार-बार अवसर देती है, लेकिन हम हर बार उसे गंवा देते हैं। पिछली अगस्त की भारी बारिश और यमुना बेसिन में आई बाढ़ ने साबित कर दिया कि ये नदियाँ आज भी जीवित हो सकती हैं। आगरा सिविल सोसाइटी की रिपोर्टों के अनुसार राजस्थान की पहाड़ियों से निकलने वाली ये धाराएँ कभी पूरे ब्रज क्षेत्र को हरा-भरा रखती थीं। अंग्रेजों के दौर में बनी सिंचाई संरचनाएँ—बांध, नहरें और मोरियाँ—एक सुव्यवस्थित जल प्रणाली का हिस्सा थीं, जो आज आज़ादी के बाद की उपेक्षा के चलते खंडहर बन चुकी हैं।
आगरा के सिविल सोसाइटी कार्यकर्ता राजीव सक्सेना, असलम सलीमी और अनिल शर्मा ने केवल आलोचना नहीं की, बल्कि व्यावहारिक समाधान भी सुझाए हैं। उतंगन-यमुना संगम, रेहावली (फतेहाबाद) के पास दोतरफा चेक डैम बनाने का प्रस्ताव अनुभव पर आधारित है। यमुना में उफान या बाढ़ की स्थिति में पानी उल्टा बहकर उतंगन में करीब 20 किलोमीटर तक लगभग 13 फुट गहराई के साथ चला जाता है। यह प्रक्रिया मानसून में कम से कम चार बार होती है, लेकिन इस अमूल्य जल को रोकने और सहेजने की कोई व्यवस्था नहीं है।
यदि इस पानी को संरक्षित किया जाए तो लगभग 35 किलोमीटर क्षेत्र में भूजल रिचार्ज संभव है। सिंचाई को नया जीवन मिल सकता है और पेयजल संकट से राहत मिल सकती है। ताजगंज और फतेहाबाद रोड के सैकड़ों होटल, जो वर्तमान में भूजल का अत्यधिक दोहन कर रहे हैं, उन्हें सतही जल उपलब्ध कराया जा सकता है। फतेहाबाद, शमशाबाद और किरावली जैसे कस्बों की प्यास बुझ सकती है। बटेश्वर जैसे धार्मिक स्थलों को पर्व-त्योहारों के दौरान पर्याप्त जल मिल सकता है, लेकिन ये सभी प्रस्ताव कागजों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
पर्यावरणविद डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य का कहना है कि सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत में आज भी छोटी नदियों के लिए कोई समग्र राष्ट्रीय नदी नीति नहीं है। राज्य सरकारें इन्हें प्राथमिकता देने को तैयार नहीं हैं। संरक्षण की जिम्मेदारी कई विभागों में बंटी हुई है, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं। आगरा में कभी गठित रिवर पुलिस का आज कोई अस्तित्व नजर नहीं आता, न अतिक्रमण रुक रहा है और न प्रदूषण।
रिवर कनेक्ट कैंपेन का मानना है कि नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं होतीं, बल्कि हमारी सभ्यता, संस्कृति और सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। उन्हें नालों में बदल देना केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्महत्या है। जब छोटी नदियाँ मरती हैं तो बड़ी नदियाँ भी बीमार पड़ती हैं, भूजल स्तर गिरता है और बाढ़ व सूखे दोनों का खतरा बढ़ता है।
आज भी समय है, लेकिन केवल तभी जब सरकारें इच्छाशक्ति दिखाएँ, छोटी नदियों को योजनाओं के हाशिये से निकालें और उन्हें जीवन-तंत्र मानकर पुनर्जीवित करें। अन्यथा इतिहास यही दर्ज करेगा कि हमारे पास नदियों को बचाने का अवसर था, और हमने उसे उदासीनता के साथ बह जाने दिया।
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